इक लहर मिलने आई थी,
किनारे से बड़ी दूर से.
इक लहर मिलने आई थी,
किनारे से बड़ी दूर से.
पहुची तो क्या देखा उसने
किनारा चमक रह था चंदा के नूर से
अब लहर को देखो, किनारे से शिकायत है.
चंदा की चमक को,उसकी आँखों में देखकर आहत है.
रूठी हुई लहर को देखकर,किनारा भी मायूस हो उठा
लेकिन प्यार सच्चा था शायद उसका,इसीलिए वो लहर से बोल उठा
रात हो गयी प्रिय ,तुमको यहाँ आते आते
तुम तलाश न पाती मुझे,इस रात के अंधियारे में
इंतजार मै बस तुम्हारा ही कर रह था..
उजाला हुआ तन पहचान लोगी तुम.
बस इसीलिए चंदा की चांदनी में चमक रहा था.
लहरें तो कई आकर भी चली गयी..
लेकिन आत्मा तो मेरी,प्यासी ही रही गयी..
आकर समां जायो प्रिय,इस प्यासे की बाहों में.
कही दिनों से जल रहा हूँ,इस समुन्दर की राहो में
पा लिया प्यार अपना,समाकर लहर ने उस किनारे में.
यही करती है प्रेमिका,प्रेमी को पाने की चाहत में
क्यों इस तरह दो प्रेमियों का मिलना
इस सूरज रूपी ज़माने को बर्दास्त नहीं होता है.....
जैसे ही अंगड़ाई लेती है रात
और सूरज का शुरू होता पहरा है ....
निगाह पड़ते ही दोनों पर,सूरज जलकर गरम हो उठता है...
और जलाकर अपनी गर्मी से,लहर को किनारे से अलग कर देता है.
लहर को किनारे से अलग कर देता है.
