Saturday, 11 May 2013

चप्पले


चलने को तो मैं ,  सौ कदम भी तैयार था 
बदनसीबी थी मेरी , पैरो में चप्पल नहीं थी.

काँटों का दर्द तो शायद , मैं सहन भी कर लेता
मगर डर था मुझे , तो सिर्फ शरम के एहसास का

इसका गिला शिकवा भी अब , किस से किया जाये
अपने भी तो यारो ...इसी दर्द के मारे है

चल पाया हूँ मैं ...आज तक दो कदम जो
उन्होंने ही तो चप्पल ...अपने कदमो से उतारे है.




Friday, 1 March 2013

जालिम तेरी नजरे

                                             

                                                        तुझ पर तो एतबार ,शुरू से ही न था.
                                                    मगर जालिम तेरी नजरो से धोखा खा गए.

                                                       जितनी जुर्रत की, तुझसे दूर जाने की....
                                                         उतनी ही सिद्दत से तेरे पास आ गए.

Wednesday, 30 May 2012


क़द्र की होती, जो अगर तेरे प्यार की
तो शायद जिंदगी ने मुझे अपना लिया होता !!

ना कहर बरपाता, गमो का सूरज हम पर इतना
जो आँचल तेरे प्यार का हमने ओढ़ लिया होता !!
गम सहने की आदत, अब पड चुकी है इतनी
कि हर ख़ुशी से अब डर सा लगता है....

मानो कि कोई रिश्ता सा, बन गया हो दर्द के साथ
ख़ुशी का साथ तो अब मेहमानों सा लगता है....

Saturday, 24 March 2012






                                                    पी तो नहीं है,मैंने शराब यारो
                                        फिर भी छाया,कुछ नशा सा है.


                              आदत तो नहीं है,इस नशे की हमें यारो.
                               फिर ना जाने,आ रहा कुछ मजा सा है.


                               टकराई तो थी, तेरी नजरो से मेरी आँखे
                           और लगा भी था,यह अंदाज तो कातिलाना है.


                             मगर क़त्ल होकर भी,धड़क रहा है यह दिल
                           क़त्ल करने का ये अंदाज,शायद कुछ नया सा है.


                          क़त्ल करने का ये अंदाज,शायद कुछ नया सा है.............

Monday, 12 December 2011


इक लहर मिलने आई थी,
किनारे से बड़ी दूर से.

इक लहर मिलने आई थी,
किनारे से बड़ी दूर से.
 


पहुची तो क्या देखा उसने
किनारा चमक रह था चंदा के नूर से


अब लहर को देखो, किनारे से शिकायत है.
चंदा की चमक को,उसकी आँखों में देखकर आहत है.


रूठी हुई लहर को देखकर,किनारा भी मायूस हो उठा 
लेकिन प्यार सच्चा था शायद उसका,इसीलिए वो लहर से बोल उठा 


रात हो गयी प्रिय ,तुमको यहाँ आते आते
तुम तलाश न पाती मुझे,इस रात के अंधियारे में


इंतजार मै बस तुम्हारा ही कर रह था..
उजाला हुआ तन पहचान लोगी तुम.
बस इसीलिए चंदा की चांदनी में चमक रहा था.


लहरें तो कई आकर भी चली गयी..
लेकिन आत्मा तो मेरी,प्यासी ही रही गयी..


आकर समां जायो प्रिय,इस प्यासे की बाहों में.
कही दिनों से जल रहा हूँ,इस समुन्दर की राहो में


पा लिया प्यार अपना,समाकर लहर ने उस किनारे में.
यही करती है प्रेमिका,प्रेमी को पाने की चाहत में 


क्यों इस तरह  दो प्रेमियों का मिलना
इस सूरज रूपी ज़माने को बर्दास्त नहीं होता है.....


जैसे ही अंगड़ाई लेती है रात
और सूरज का शुरू होता पहरा है  ....


निगाह पड़ते ही दोनों पर,सूरज जलकर गरम हो उठता है...
और जलाकर अपनी गर्मी से,लहर को किनारे से अलग कर देता है.

लहर को किनारे से अलग कर देता है.